अध्याय 16

मैंने सिर घुमाकर खिड़की के बाहर देखा—धुंधली रोशनियाँ और परछाइयाँ तेज़ी से फिसलती चली जा रही थीं।

मेरा दिल जैसे बर्फ़ीले पानी में डूबा हो—सुन्न, ठंडा।

पेट के निचले हिस्से में वही मंद दर्द बना हुआ था; हाल ही में झेली गई चोट और खोने का एक ठोस, शारीरिक निशान।

“तलाक़।” मैंने शब्द को धीमे से, सपाट और भ...

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